Education

इज़राइल की वित्तीय नाकेबंदी किस तरह पश्चिमी तट में फ़िलिस्तीनी सार्वजनिक शिक्षा को खत्म कर रही है

इज़राइल, फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को मिलने वाली धनराशि रोककर, पश्चिमी तट में वित्तीय संकट को गहरा रहा है। इसका असर शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर पड़ रहा है। शिक्षकों के वेतन में कटौती की गई है और कई स्कूलों में कक्षाएँ बंद कर दी गई हैं। 
अक्टूबर 2023 से फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण ने शिक्षकों के काम के घंटे कम कर दिए हैं और उनके लिए 2,000 शेकेल का एक समान मासिक वेतन लागू कर दिया है। यह कदम इज़राइल की उस नीति के जवाब में उठाया गया, जिसके तहत वह व्यवस्थित रूप से सीमा शुल्क से होने वाली आय रोक रहा है। इज़राइली अधिकारियों ने खुलकर इस नीति को फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को कमजोर करने और पश्चिमी तट का विलय करने की अपनी मंशा से जोड़ा है। इस वित्तीय नाकेबंदी ने पहले से मौजूद संकट को और गहरा कर दिया है। सरकारी स्कूलों के शिक्षक पिछले एक दशक से टूटे हुए वादों, वेतन में ठहराव और 2016, 2022 तथा 2023 की हड़तालों के बाद दंडात्मक तबादलों का सामना कर रहे हैं। स्कूल सप्ताह छोटा होने से पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इससे विद्यार्थियों की आलोचनात्मक सोच विकसित करने और उनकी सीखने में भागीदारी पर भी नकारात्मक असर पड़ा है। साथ ही, कई शिक्षक कर्ज़ लेने और अतिरिक्त काम करने के लिए मजबूर हो गए हैं।

सप्ताह में तीन दिन, हेब्रोन के उत्तर में स्थित अल-अर्रूब शरणार्थी शिविर में रहने वाले उमर मुहैसिन सुबह उठते हैं और एक सरकारी माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक के रूप में अपना दिन शुरू करते हैं। उन्होंने Mondoweiss को बताया, “जल्दी से नाश्ता करने के बाद मेरे तीनों बच्चे कॉलेज के लिए निकल जाते हैं। मैं हर एक को आने-जाने के खर्च के लिए 23 शेकेल और कुछ खाने के लिए 10 शेकेल देता हूँ। फिर मेरी पत्नी काम पर चली जाती हैं और मैं अपनी कार से निकलता हूँ। अगर मेरे पास पेट्रोल भरवाने के लिए पैसे बचे हों तो मैं कार से जाता हूँ। लेकिन अगर पैसे नहीं होते, तो मुझे पाँच किलोमीटर पैदल चलकर बैत उम्मार गाँव तक जाना पड़ता है। वहाँ से भी मुझे गाँव के बाहरी इलाके सफा में स्थित उस माध्यमिक विद्यालय तक पैदल जाना पड़ता है, जहाँ मैं प्राकृतिक विज्ञान पढ़ाता हूँ।”

उमर मुहैसिन सप्ताह में केवल तीन दिन काम करते हैं। यह भी हर सप्ताह बदलता रहता है, क्योंकि फ़िलिस्तीनी शिक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर 2023 से शिक्षकों के काम के घंटे कम कर दिए हैं। यह फैसला बढ़ते वित्तीय संकट के अनुरूप व्यवस्था करने के लिए लिया गया। इस संकट की मुख्य वजह यह है कि इज़राइल, फ़िलिस्तीन की सीमाओं पर अपने नियंत्रण के कारण वसूले गए फ़िलिस्तीनी सीमा शुल्क के राजस्व को लगातार रोक रहा है।

2019 से अब तक इज़राइल लगभग चार अरब डॉलर की राशि रोक चुका है। वहीं, इज़राइल के वित्त मंत्री बेज़लेल स्मोट्रिच कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उनका लक्ष्य फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को "आर्थिक रूप से ध्वस्त करना" है। इस नीति ने फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण पर वित्तीय दबाव और बढ़ा दिया है। इसके कारण उसे कर्मचारियों को पूरा वेतन देने के बजाय आंशिक वेतन देना पड़ रहा है। साथ ही, अक्टूबर 2023 से वह व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक सेवाओं के कामकाजी घंटे भी कम कर रहा है।

सरकारी स्कूलों में यह संकट कोई नया नहीं है, बल्कि पहले से चले आ रहे संकट की ही निरंतरता है। सरकारी स्कूलों के शिक्षक एक दशक से भी अधिक समय से अपनी अस्थिर कार्य परिस्थितियों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। 2016 में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों ने पूरे पश्चिमी तट में बड़े पैमाने पर हड़ताल की। उनकी मांग थी कि बढ़ती महँगाई के अनुरूप उनके वेतन में बढ़ोतरी की जाए। बाद में उनकी मांगों में शिक्षकों के आन्दोलन को एक स्वतंत्र यूनियन के रूप में मान्यता देने की मांग भी शामिल हो गई। 

यह हड़ताल 2022 में फिर शुरू हुई और 2023 की शुरुआत में एक बार फिर हुई। हर बार फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण की सरकार के साथ समझौते हुए, लेकिन उनमें से किसी को भी लागू नहीं किया गया। आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले कई शिक्षकों को बाद में समय से पहले सेवानिवृत्त कर दिया गया या उमर मुहैसिन की तरह दूर-दराज के स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया।

मुहैसिन कहते हैं, “मैं 2022 की हड़ताल में शामिल था और उस समय हेब्रोन शहर के एक स्कूल में पढ़ाता था। हड़ताल के बाद मेरा तबादला शहर और अपने सहकर्मियों से दूर, बैत उम्मार के सफा स्कूल में कर दिया गया।” इसके बावजूद मुहैसिन शिक्षकों के आन्दोलन में सक्रिय बने हुए हैं। उनके शब्दों में, “मैं 2,000 शेकेल महीने में अपने परिवार का गुज़ारा नहीं कर सकता। और इस बारे में कुछ न करने से हालात बेहतर नहीं होने वाले।”

अक्टूबर 2023 से फ़िलिस्तीनी शिक्षा मंत्रालय ने स्कूल सप्ताह घटाकर केवल तीन दिन कर दिया है। कुछ मामलों में तो स्कूल का दिन भी घटाकर केवल तीन कक्षाओं का कर दिया गया है। इसका असर फ़िलिस्तीनी युवाओं की पूरी एक पीढ़ी की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ा है। साथ ही, उमर मुहैसिन और उनके कई सहकर्मियों के लिए इसने उनके पेशे से जुड़े उद्देश्य और प्रतिबद्धता की भावना को भी कमजोर कर दिया है।

मुहैसिन कहते हैं, “अब मैं पहले की तरह प्रयोगों के जरिए पढ़ा नहीं सकता और न ही विद्यार्थियों को नई बातें खोजने के लिए प्रेरित कर सकता हूँ।” वह याद करते हुए कहते हैं, “मैं अपनी कक्षाओं के लिए वीडियो और प्रयोग तैयार करता था, ताकि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच विकसित हो और वे खुद सीखने की कोशिश करें। मेरे लिए पढ़ाना एक जुनून था और मेरे विद्यार्थी भी पूरे उत्साह के साथ सीखने में शामिल रहते थे।” आज, पढ़ाने का समय कम होने के कारण मुहैसिन से उम्मीद की जाती है कि वे साल के अंत तक पूरा पाठ्यक्रम समाप्त करें। इसकी वजह से उन्हें विषयों को केवल सरसरी तौर पर पढ़ाना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके विद्यार्थियों की सीखने की गुणवत्ता पर पड़ता है।

मुहैसिन बताते हैं, “जो विद्यार्थी पहले अच्छे अंक लाते थे, वे भी पढ़ाई में पिछड़ गए और उनकी रुचि कम हो गई।” वह कहते हैं कि स्कूल के दिनों के बीच लंबे अंतराल के कारण उन्हें बार-बार पुराने पाठ दोहराने पड़ते हैं, क्योंकि नियमित गृहकार्य और लगातार मार्गदर्शन न मिलने से विद्यार्थियों की पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है। मुहैसिन अफसोस जताते हुए कहते हैं, “एक विद्यार्थी ने पढ़ाई में रुचि खो दी और स्कूल के दिनों के बीच अपने पिता के मुर्गी फार्म में काम करना शुरू कर दिया। अब उसकी पढ़ाई में दोबारा रुचि जगाना बहुत मुश्किल हो गया है।”

इस संकट का असर शिक्षकों के जीवन पर भी गहराई से पड़ रहा है। फ़िलिस्तीन के सरकारी स्कूलों के शिक्षक पहले से ही सबसे कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों में शामिल रहे हैं। मौजूदा संकट ने उनके लिए अपने परिवार का गुज़ारा करना और भी कठिन बना दिया है।

7 अक्टूबर के बाद फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण ने न केवल शिक्षकों के वेतन में किसी भी बढ़ोतरी पर रोक लगा दी, बल्कि सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए 2,000 शेकेल का एक समान मासिक वेतन भी लागू कर दिया। यह व्यवस्था सेवा के वर्षों, अनुभव या कार्य परिस्थितियों की परवाह किए बिना लागू की गई, जबकि पहले शिक्षकों के कार्यस्थल का स्थान भी उनके वेतन को प्रभावित करता था। फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण का कहना है कि वह इस नई एक समान वेतन व्यवस्था और शिक्षकों के पहले के वेतन, साथ ही वादा की गई वेतन वृद्धि के बीच के अंतर का रिकॉर्ड रख रहा है। उसने यह भी आश्वासन दिया है कि धन उपलब्ध होने पर यह अंतर चुका दिया जाएगा। लेकिन मुहैसिन का मानना है कि इन वादों का अब कोई खास मतलब नहीं रह गया है। उनके अनुसार, यह वित्तीय संकट राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है और फिलहाल उनमें सुधार के कोई संकेत दिखाई नहीं देते।

दरअसल, जैसा कि इज़राइली अधिकारियों ने स्पष्ट किया है, फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण की वित्तीय नाकेबंदी इज़राइल की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को ध्वस्त करना और पश्चिमी तट का विलय करना है। यह संभावना लगातार अधिक वास्तविक होती दिखाई दे रही है।

मुहैसिन कहते हैं, “फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण जिस तरह इस संकट से निपट रहा है, उसमें शिक्षा उसकी प्राथमिकता नहीं है। उपलब्ध धन का उपयोग शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए नहीं किया जा रहा। न्यायाधीशों जैसे अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों पर हमारे जैसा बोझ नहीं डाला गया है।”वह आगे कहते हैं, “हमारी मांग है कि इस संकट का बोझ सभी पर समान रूप से बाँटा जाए और शिक्षा व्यवस्था को बचाना प्राथमिकता बनाया जाए।” 

मुहैसिन के घर में इस संकट का असर साफ़ दिखाई देता है। वह बताते हैं, “मात्र पिछले एक साल में मेरे आने-जाने का खर्च 5 शेकेल से बढ़कर 11 शेकेल हो गया है। एक किलो चिकन की कीमत 11 शेकेल से बढ़कर 17 शेकेल हो गई है। एक गैलन खाने का तेल 95 शेकेल से बढ़कर 130 शेकेल और चावल 110 शेकेल से बढ़कर 160 शेकेल हो गया है।” वह कहते हैं, “पहले घर में दोपहर और रात के लिए अलग-अलग खाना बनता था। अब हम एक ही बार खाना बनाते हैं और उसे दोपहर तथा रात, दोनों समय खाते हैं।”

मौजूदा वित्तीय संकट से पहले भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए दूसरी, बल्कि तीसरी नौकरी करना आम बात थी। लेकिन अब उनमें से कई के लिए यह भी संभव नहीं रह गया है। उमर मुहैसिन के सहकर्मियों में कोई टैक्सी चलाता है, कोई बिजली का काम करता है, कोई निजी ट्यूशन पढ़ाता है, कोई दुकान चलाता है, कोई खेती करता है और कोई भेड़-बकरियाँ चराता है। मुहैसिन पहले इज़राइल में निर्माण मजदूर के रूप में काम करते थे, जहाँ फ़िलिस्तीनी निर्माण मजदूरों की बड़ी संख्या अपनी आजीविका कमाती थी। वह कहते हैं, “मैं नक़ब रेगिस्तान के बीर अल-सबा में काम करता था। लेकिन कब्ज़ा करने वाली सत्ता ने काम के परमिट रद्द कर दिए, इसलिए अब मैं वहाँ काम नहीं कर सकता।”

मुहैसिन बताते हैं, “मेरे कई सहकर्मियों को अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी है। हम सभी अपनी बचत पूरी तरह खर्च कर चुके हैं। मुझे भी कर्ज़ लेना पड़ा है और इस समय मुझ पर 15,000 शेकेल का कर्ज़ है।”

पश्चिमी तट में फ़िलिस्तीनी समाज पर इज़राइल के आर्थिक और सामाजिक दबाव का असर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के संकट में साफ़ दिखाई देता है। लेकिन यह संकट इससे कहीं अधिक गहरा है। 

फ़िलिस्तीनी मानवाधिकार वकील इसाम अब्दीन, जो 2016 से शिक्षकों के आन्दोलन के दौरान उनका साथ देते और उन्हें कानूनी सलाह देते रहे हैं, कहते हैं कि यह संकट “फ़िलिस्तीनी व्यवस्था में मौजूद एक बड़े और गहरे संकट का केवल एक लक्षण है।”

अब्दीन ने Mondoweiss को बताया, “यदि शिक्षा व्यवस्था के संकट और व्यापक रूप से फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के संकट को केवल वित्तीय संकट के नज़रिए से समझने की कोशिश की जाए, तो यह बहुत सतही समझ होगी।” वह कहते हैं, “पूरी व्यवस्था राजनीतिक कारणों से संकट में फँस गई है। यही वजह है कि शिक्षकों के संकट का सही समाधान निकालना बहुत कठिन हो गया है।”

अब्दीन आगे कहते हैं, “पिछले 20 वर्षों से, यानी आख़िरी बार चुनाव होने के बाद से, सामान्य राजनीतिक जीवन नहीं रहा है। इससे सामाजिक संवाद लगभग दम तोड़ चुका है। इसका असर इस बात में भी दिखाई देता है कि शिक्षकों के आन्दोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों के साथ किस तरह व्यवहार किया गया।” वह कहते हैं कि 2016 की हड़ताल के बाद शिक्षकों के आन्दोलन को “कुचल दिया गया और अपमानित किया गया।” उनके अनुसार, “ऐसी स्थिति में पहुँच चुके आन्दोलन को फिर से खड़ा करना बहुत मुश्किल होता है।”

अब्दीन का मानना है कि फ़िलिस्तीनी व्यवस्था में पैदा हुए इस संकट के लिए पश्चिमी देशों की भी प्रत्यक्ष भूमिका रही है। वह कहते हैं, “फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण और फ़िलिस्तीनी नागरिक समाज के संगठनों के प्रमुख समर्थकों, जैसे अमेरिका और यूरोपीय देशों, ने यह सुनिश्चित करने के बजाय कि फ़िलिस्तीन में लोकतांत्रिक राजनीतिक जीवन कायम रहे, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को फ़िलिस्तीनी संस्थानों पर थोपने पर अधिक ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि लोकतांत्रिक संवाद लगभग असंभव हो गया।” अब्दीन आगे कहते हैं, “इसी बेहद संवेदनशील समय पर इज़राइल ने वित्तीय संकट थोप दिया, जिससे हालात सौ गुना अधिक बदतर हो गए।” 

उमर मुहैसिन भी इससे सहमत हैं। उनका कहना है कि इसका गहरा असर पूरे फ़िलिस्तीनी समाज पर पड़ेगा। वह कहते हैं, “हम शिक्षकों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। जिस दिशा में हालात बढ़ रहे हैं, उसमें केवल वही लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाएँगे जो निजी स्कूलों का खर्च उठा सकते हैं।” मुहैसिन अपने पेशे की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि वित्तीय संकट के कारण उनके कई सहकर्मी सरकारी स्कूलों की नौकरी छोड़कर निजी स्कूलों में काम करने लगे हैं। वह कहते हैं, “फ़िलिस्तीन को कभी अरब दुनिया का सबसे शिक्षित समाज माना जाता था। लेकिन अगर अभी हालात नहीं बदले, तो केवल एक पीढ़ी के भीतर हमारा भविष्य बहुत अंधकारमय हो सकता है।”

क़स्साम मुआद्दी Mondoweiss के फ़िलिस्तीन स्टाफ़ राइटर हैं। उन्हें Twitter/X पर @QassaMMuaddi पर फ़ॉलो करें।

Available in
EnglishSpanishPortuguese (Brazil)GermanFrenchItalian (Standard)TurkishArabicHindiBengaliRussian
Author
Qassam Muaddi
Translators
Zaryat, Ashutosh Mitra and ProZ Pro Bono
Date
09.07.2026
Source
MondoweissOriginal article🔗
EducationPalestine
Progressive
International
Privacy PolicyManage CookiesContribution SettingsJobs
Site and identity: Common Knowledge & Robbie Blundell