30 जून को एक इज़रायली सैनिक ने अपने निजी इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक फ़िलिस्तीनी व्यक्ति की तस्वीर डाली, जो देखने में बीस-बाईस साल का लग रहा था। वह सिर्फ़ अंडरवियर में था, आँखों पर काला कपड़ा बँधा था, हाथ पीठ के पीछे मज़बूत प्लास्टिक की पट्टी से कसे हुए थे और शरीर को रस्सियों से लोहे के एक पलंग से बाँध दिया गया था। लीक हुई इस तस्वीर के साथ सैनिक ने हिब्रू में सिर्फ़ एक शब्द लिखा था: "सुप्रभात।"
दुनिया के लिए, और सोशल मीडिया पर दूर से यह सब देखने वालों के लिए, यह तस्वीर युद्ध में गिरफ़्तारी, यातना और इंसानी गरिमा के हनन के रोज़ जुड़ते दस्तावेज़ों में एक और कड़वा सबूत भर थी। लेकिन घिरे हुए गाज़ा पट्टी में वही तस्वीर एक "ज़हरीली-सी उम्मीद की किरण" बन गई, जिसने चार परिवारों को उथल-पुथल में डाल दिया। हर परिवार का दावा था कि तस्वीर में बँधा आदमी उनका पति, बेटा या भाई है, जो महीनों से लापता है।
इस तस्वीर पर छिड़ा तीखा विवाद उस रोज़ की, अनदेखी लड़ाई को सामने लाता है जिसमें लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके अपने ज़िंदा हैं और उनके मिलने का इंतज़ार किया जा सकता है, या वे मर चुके हैं और 6.1 करोड़ टन से ज़्यादा मलबे और कंक्रीट के नीचे दफ़न हैं।
गाज़ा में हज़ारों औरतों के लिए, यानी उन पत्नियों या विधवाओं के लिए जिनके पति अब भी लापता हैं, एक और भी क्रूर सच्चाई सामने आई है। उन्हें सिर्फ़ यही दर्द नहीं सहना पड़ता कि उन्हें पता नहीं पति कहाँ हैं या वे उन्हें दफ़ना भी नहीं सकीं। वे एक कानूनी और प्रशासनिक शून्य में भी फँसी हैं, जहाँ वे और उनके बच्चे अधर में लटके हैं। यह समाज परंपरागत रूप से पितृसत्तात्मक है और पूरी तरह कागज़ों पर चलता है। ऐसे में जिन औरतों के पास कमाने वाला कोई मर्द नहीं और पति की मौत का कोई आधिकारिक सबूत भी नहीं, वे न अपनी ज़िंदगी चला पाती हैं, न बच्चों को ग़रीबी और अस्थिरता से बचा पाती हैं।
ऐसी ही एक महिला हैं ग़दीर अल-ग़ूल, अमीन अल-ग़ूल की पत्नी, जो नवंबर 2023 से लापता हैं। जून में तस्वीर वायरल होने के बाद जिन चार परिवारों ने बँधे हुए, आँखों पर पट्टी वाले उस आदमी को अपना बेटा बताया, अल-ग़ूल परिवार उनमें से एक था।
तस्वीर सामने आने के बाद से ग़दीर दिन में सैकड़ों बार काँपती उँगलियों से ज़ूम की हुई स्क्रीन को छूती हैं। कभी गर्दन पर बने छोटे काले निशान पर, कभी कंधे के जाने-पहचाने झुकाव पर, कभी पैरों की उस ख़ास बनावट पर, जो उन्हें शादी के इतने सालों में ज़ुबानी याद हो चुकी है।
"मैं अमीन के चेहरे-मोहरे और उसके शरीर के निशान पहचानती हूँ। मेरी आँखें कभी धोखा नहीं खातीं और मेरी याददाश्त कभी नहीं भूलती, चाहे दिन कितने ही लंबे हो जाएँ या यह जंग कितनी ही बेरहम हो जाए," ग़दीर ने मोंडोवाइस को बताया।
"मैं पूरे दिल से चाहती हूँ कि तस्वीर में वही हो, भले ही वह क़ैदी हो, उस पर ज़ुल्म हो रहा हो और उसे ज़लील किया जा रहा हो। मेरे लिए हिरासत का मतलब है कि वह अब भी साँस ले रहा है, इस धरती पर ज़िंदा है। लेकिन अनजान गुमशुदगी एक धीमी मौत है, जो हमारी रूहों को खा जाती है।"
ग़दीर अल-ग़ूल के नुक़सान का सिलसिला नवंबर 2023 में शुरू हुआ। उनके घर पर हुए हमले में दर्जनों करीबी रिश्तेदार मारे गए थे। इस नरसंहार के बाद उनके पति अमीन को गहरा मानसिक सदमा लगा और नर्वस ब्रेकडाउन हो गया। उन्हें इलाज के लिए दीर अल-बलह के अल-अक़्सा शहीद अस्पताल ले जाया गया। एक अफ़रा-तफ़री भरे दिन, जब अस्पताल के गलियारों में मृतकों और घायलों की भीड़ लगी थी, उनके साथ मौजूद लोगों ने जागकर देखा कि उनका बिस्तर बिल्कुल ख़ाली है। तब से उनकी कोई ख़बर नहीं मिली, न यह कि वे किस तरफ़ गए, न यह कि उन्हें कौन ले गया।
तब से लगभग तीन साल तक ग़दीर उलझन में लटकी रहीं। उन्हें नहीं पता था कि उनके पति मर चुके हैं या किसी इज़रायली जेल में बंद हैं। तभी यह लीक हुई तस्वीर सामने आई।
उन्हें लगा कि तस्वीर वाला आदमी अमीन जैसा दिखता है, लेकिन उनकी उलझन तब और बढ़ गई जब इज़रायली मीडिया में यह दावा चला कि वह बंदी कुछ हफ़्ते पहले ही उत्तरी गाज़ा के बैत हानून इलाक़े में एक सैन्य ठिकाने की ओर बढ़ते हुए पकड़ा गया था। यह समय और जगह अमीन के 2023 में गाज़ा पट्टी के बीच में स्थित अल-अक़्सा अस्पताल से लापता होने से बिल्कुल मेल नहीं खाते। इस विरोधाभास ने ग़दीर को दो हिस्सों में बाँट दिया है: एक तरफ़ सबूतों को तौलता दिमाग़, दूसरी तरफ़ वह दिल जो उन्हें मानने से इनकार करता है।
ग़दीर की त्रासदी भावनात्मक तबाही पर ही नहीं रुकी। अपने जैसी अनगिनत औरतों की तरह उन्हें मानसिक और आर्थिक, दोनों तरह की रुकावटों का सामना करना पड़ा है। चूँकि अमीन प्रशासनिक रूप से बिना मृत्यु प्रमाणपत्र के "लापता" दर्ज हैं, वे अपने पति के बैंक खाते से पैसे नहीं निकाल सकतीं, जबकि परिवार की जमा-पूँजी उसी खाते में है। कई राहत वितरण केंद्रों पर भी उन्हें अड़चनें झेलनी पड़ीं, क्योंकि वहाँ "परिवार के मुखिया" की मौजूदगी ज़रूरी है, यानी कोई मर्द, या ऐसी विधवा जो अपने पति की मौत साबित कर सके। ग़दीर के पास इनमें से कुछ भी नहीं है।
"बैंक मुझसे पावर ऑफ़ अटॉर्नी या मृत्यु प्रमाणपत्र माँगता है, तभी मैं पति के खाते से पैसे निकाल सकती हूँ। और राहत संगठन मुझे ऐसे देखते हैं जैसे मेरा पति यहीं मौजूद है और ख़ुद जाकर खाना ला सकता है!" ग़दीर ने कड़वाहट से कहा। "मेरे पास न पैसे हैं, न वे काग़ज़ात जिनसे मैं अपने बच्चों का पेट भरने के लिए खाने का एक पैकेट पा सकूँ।"
सबसे गहरी चोट उनके बच्चों की मानसिक और सामाजिक हालत में गिरावट है। उनका छोटा बेटा अनजाने में बिस्तर गीला कर देता है और ऐसे बुरे सपने देखता है जिनमें वह अपने पिता का नाम चिल्लाता है।
"मेरे बच्चे अब वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे। मेरा छोटा बेटा रात को डरकर उठ जाता है और चीख़ता है, 'बाबा कहाँ हैं?' तंबू के अंदर वे सबसे कट गए हैं, किसी से घुलते-मिलते नहीं, खेलते भी नहीं, जैसे उन्हें अपने पिता की ग़ैरमौजूदगी पर शर्म आती हो," ग़दीर ने कहा। "अगर मैं एक मिनट के लिए भी उन्हें छोड़ दूँ तो वे घबरा जाते हैं कि मैं भी उनके पिता की तरह ग़ायब हो जाऊँगी। और सबसे मुश्किल यह है कि उन्हें बहलाने के लिए एक टॉफ़ी ख़रीदने तक के पैसे मेरे पास नहीं हैं।"
ग़दीर की कहानी गाज़ा की हर उस औरत की कहानी है जिसका पति लापता है। उनकी रोज़मर्रा की हर चीज़, चाहे राहत लेना हो, बैंक खाता चलाना हो या बच्चों की कस्टडी और काग़ज़ी कार्रवाई, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज उनकी वैवाहिक स्थिति से जुड़ी है। लेकिन जब पति का हश्र ही साबित नहीं हो सकता, तो उनके कानूनी अधिकार एक तरह से जम जाते हैं।
शव की भौतिक मौजूदगी के बिना (या शव मिलने की किसी चिकित्सकीय रूप से पुष्ट आधिकारिक रिपोर्ट के बिना) कोई विवाहिता कानूनी मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल नहीं कर सकती। और इस एक दस्तावेज़ के बिना बैंकिंग और प्रशासन की हर प्रक्रिया ठप हो जाती है। वह न अपना या अपने बच्चों का उत्तराधिकार का हक़ माँग सकती है, न परिवार का ख़र्च चलाने के लिए पति की संपत्ति बेच सकती है, यहाँ तक कि विधवा पेंशन या मृतकों के परिवारों के लिए तय वज़ीफ़े भी नहीं ले सकती। इन सबके लिए इस बात का आधिकारिक सबूत चाहिए कि परिवार ने अपना कमाने वाला खो दिया है।
उम्म यूसुफ़ अल-फ़ार की कहानी में यह पीड़ा साफ़ दिखती है। उनके पति राएद दिसंबर 2023 में रफ़ाह की उस मस्जिद से बाहर निकले थे जहाँ परिवार ने पनाह ली थी। वे अपनी बीमार बेटी के लिए खाना-पानी ढूँढने गए थे कि उसी इलाक़े पर इज़रायली हवाई हमला हो गया। बाद में उनका नाम मृतकों की मौक़े पर बनी सूचियों में आया, लेकिन तबाही के स्तर और हालात के ख़तरनाक होने की वजह से बचाव दल उनका शव कभी खोज या निकाल नहीं पाए।
उम्म यूसुफ़ अब बेबसी में दो पाटों के बीच फँसी हैं: एक तरफ़ कैंसर से धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ती बेटी है, दूसरी तरफ़ पैर की वह तकलीफ़ जो हर क़दम पर चुभती है। वे रोज़ ख़ुद को घसीटकर राहत का पैकेट लेने जाती हैं, जो अधिकारी उन्हें देने से इनकार कर देते हैं। उनका कहना है कि "मुख्य लाभार्थी" उनके पति हैं, और पावर ऑफ़ अटॉर्नी या मृत्यु प्रमाणपत्र के बिना उन्हें कोई हक़ नहीं।
"मैं अब शाती शरणार्थी शिविर में अपने घर की ढही हुई छत के नीचे लगे एक जर्जर तंबू में रहती हूँ," उम्म यूसुफ़ ने मोंडोवाइस से कहा। "मेरे पैर में खून का थक्का है, जिससे मैं ज़्यादा चल-फिर नहीं सकती, काम नहीं कर सकती। और मैं अकेले अपने चार बच्चों को पाल रही हूँ, जिनमें से एक कैंसर से जूझ रहा है। उसे इलाज, देखभाल और ऐसा खाना चाहिए जो बाज़ार में मिलता ही नहीं। मेरे पास ऐसा कोई काग़ज़ नहीं जो साबित करे कि राहत पर या मृतकों के परिवारों के लिए तय वज़ीफ़ों पर मेरा या मेरे बच्चों का हक़ है।"
"यह व्यवस्था मेरे पति को ऐसे मानती है जैसे वे अब भी ज़िंदा हों और अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हों, जबकि हक़ीक़त में मुझसे और मेरे बच्चों से इज़्ज़त की ज़िंदगी के सबसे बुनियादी अधिकार भी छिन गए हैं। हम पड़ोसियों से जो थोड़ा-बहुत बच जाता है, उसी पर ज़िंदा हैं।"
पास ही, गाज़ा शहर के अल-यरमूक इलाक़े में, अमीना अल-बहतीनी भी मौत और काग़ज़ों के बीच की इसी धुँधली ज़मीन पर वही दुःस्वप्न जी रही हैं। उन्होंने अपने छह मंज़िला घर के मलबे से कुछ ही मीटर दूर तंबू लगा लिया है, जिसे पहले एक हवाई हमले में ज़मींदोज़ कर दिया गया था। उन ढही हुई कंक्रीट की मंज़िलों के कई मीटर नीचे कहीं उनके पति मुहम्मद का शव दबा है, 24 दिसंबर 2024 से। इज़रायली हमले में दबने के बाद उन्हें निकालने के लिए कोई उपकरण या भारी मशीनरी कभी उपलब्ध ही नहीं हुई।
अमीना की लड़ाई कभी सिर्फ़ मलबे के नीचे दबे पति का ग़म नहीं रही। वह उन संस्थाओं से रोज़ की जंग बन गई जो उनसे असंभव को साबित करने की माँग करती हैं। वे बच्चों के काग़ज़ हाथ में लिए अदालतों और टूटी सड़कों के बीच भटकती हैं और ऐसे नियमों से टकराती हैं जिनमें ऐसे गवाह चाहिए जो क़सम खाकर कह सकें कि उन्होंने मलबे के नीचे लाशें देखी थीं, मानो गाज़ा में मौत ऐसे हालात में होती हो जिन्हें दर्ज किया जा सके।
वे अपने तबाह हुए घर का इलाक़ा छोड़ने से इनकार करती हैं, क्योंकि पति के शव के पास रहने में उन्हें एक कड़वा-सा सुकून मिलता है। लेकिन इस नज़दीकी की क़ीमत पूरी प्रशासनिक लाचारी है। वे धार्मिक अदालतों की उलझी हुई कार्यवाहियों से रोज़ जूझती हैं, ताकि वह एक दस्तावेज़ हासिल कर सकें जो उनके बच्चों को ग़रीबी और अधर से बाहर निकाल सके।
इस मानवीय त्रासदी के सामने गाज़ा की धार्मिक अदालतें एक ऐसी परीक्षा में पड़ गई हैं जिसकी आधुनिक न्यायिक इतिहास में कोई मिसाल नहीं है। इस्लामी न्यायशास्त्र और लापता व ग़ायब व्यक्तियों से जुड़े नियमों के मुताबिक़, किसी लापता व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए आम तौर पर चार साल या उससे ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ता है, जब तक कि मौत को एक उचित अनुमान न मान लिया जाए। उसके बाद ही अदालत औपचारिक फ़ैसला दे सकती है, संपत्ति का बँटवारा कर सकती है और पत्नी की स्थिति तय कर सकती है। लेकिन नरसंहार और पूरी तबाही के बीच चार साल इंतज़ार करने का मतलब है ग़दीर, उम्म यूसुफ़ और अमीना जैसे हज़ारों परिवारों को ग़रीबी और बुनियादी अधिकारों से वंचित होने की सज़ा देना।
इस गतिरोध से निकलने के लिए अदालतों ने परिस्थितिजन्य सबूतों और मज़बूत संकेतों का सहारा लेना शुरू किया, ताकि अनुमानित मृत्यु के जल्दी फ़ैसले दिए जा सकें। इसमें सिविल डिफ़ेंस की बमबारी संबंधी आधिकारिक रिपोर्टों और बचे हुए लोगों, पड़ोसियों और भरोसेमंद गवाहों की गवाही का सहारा लिया जाता है, जो पुष्टि कर सकें कि हमले के समय लापता व्यक्ति ठीक उसी जगह मौजूद था।
इस अपवाद-स्वरूप प्रक्रिया की बदौलत कुछ औरतें अपने लापता पति को मृत घोषित कराने वाला न्यायिक फ़ैसला हासिल कर पाई हैं, ताकि वे अपने मामले सँभाल सकें, आर्थिक दावे निपटा सकें, या न्यायिक अलगाव के लिए अर्ज़ी दे सकें और उत्तराधिकार व बच्चों की देखभाल को लेकर बने कानूनी गतिरोध को तोड़ सकें। लेकिन इस समाधान में असली जोखिम भी हैं: अगर किसी पति को "अनुमानित मृत" घोषित कर दिया गया और वह अचानक लौट आया (मसलन जेल से रिहा होकर, या किसी और तरह से बचकर), तो हो सकता है कि उसे अपनी संपत्ति पहले ही बँटी हुई और अपनी पत्नी दूसरी शादी कर चुकी मिले।
अमीना अल-बहतीनी शाम ढलते अपने तंबू में बैठी अपने घर के ढहे हुए ढाँचे और पत्थर की उन विशाल सिल्लियों को देखती रहती हैं, जिन्हें कोई बचाव दल आज तक उठा या हटा नहीं पाया। उनके लिए अदालतों की यह क़ानूनी लड़ाई कोई काग़ज़ी कार्रवाई या किसी न्यायिक गलियारे में चलती फ़िक़्ह की बहस नहीं है। यह सम्मानजनक मान्यता की लड़ाई है, जो हर सुबह उनके सामने खड़ी हक़ीक़त ने उन पर थोप दी है।
अपने छोटे बच्चे का चेहरा पोंछते हुए अमीना इस इंतज़ार का दर्द यूँ बयान करती हैं: "मैं हर रात अपने पति की क़ब्र के पास सोती हूँ, जो इस मलबे के नीचे दबी है," उन्होंने कहा। "हफ़्तों तक मैं पत्थरों के बीच से उठती उस नुक़सान की गंध महसूस करती रही। और फिर भी काग़ज़ी कार्रवाई कहती है कि दो गवाह लाओ जो औपचारिक रूप से क़सम खाकर कहें कि उन्होंने उसे उस ढही हुई छत के नीचे मरते देखा था।"
"हम चमत्कार नहीं माँग रहे," उन्होंने आगे कहा। "हम दुनिया से यह नहीं कह रहे कि हमारे पतियों के ऊपर से टनों कंक्रीट हटा दे, जब वह हमें खुदाई की मशीनें तक नहीं दे सकती। हम बस एक छोटा-सा सरकारी काग़ज़ चाहते हैं, जो हमारे ज़िंदा बच्चों को भूख से बाहर निकाल दे। ताकि हमें हर रोज़ यह चुनने पर मजबूर न होना पड़े कि अपने लापता मृतकों की गरिमा बचाएँ या अपने ज़िंदा बच्चों की जान।"
एनास अबू ग़याद गाज़ा पट्टी में रहने वाली एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी पत्रकार, लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। उनका काम व्यवस्थागत मानवाधिकार उल्लंघनों को दर्ज करने और अपने समुदाय की ज़िंदगी की सच्चाइयों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाने पर केंद्रित है। ज़मीनी कहानियाँ कहने के प्रति समर्पित एनास अपनी ज़्यादातर रिपोर्टिंग संघर्ष के बीच फ़िलिस्तीनी महिलाओं के अनुभवों और उनके हौसले पर केंद्रित करती हैं। उनके खोजी फ़ीचर और टिप्पणियाँ अल जज़ीरा इंग्लिश, द प्रोग्रेसिव, क्रिटिका और रसीफ़22 सहित कई प्रमुख क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में छप चुके हैं।
