संपादकीय टिप्पणी : वेनेजुएला के खिलाफ हमले और उसके राष्ट्रपति के अपहरण जैसी अमेरिकी आक्रामक कार्रवाइयों को देखते हुए, ‘द वायर’ मैनुएल माल्दोनादो-डेनिस के इस व्याख्यान को फिर से प्रकाशित करने जा रहा है। यह व्याख्यान रीगन काल में अमेरिकी आक्रामक नीतियों की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया था। यह साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्षेत्रीय एकता के लिए एक स्थायी आह्वान जैसा भी है और ‘अपने अमेरिका’ की सामूहिक संप्रभुता के लिए मुक्ति पर जोर देता है।
उद्धरण:
“अपने अमेरिका के लोगों के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष तुपाक अमारू से लेकर आज तक, एक साथ साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष भी रहे हैं।”
क्यूबा के हवाना में चार से सात सितंबर 1981 के बीच तमाम लेखक, कवि और विद्वान *“प्रिमेरो एन्कुएंत्रो दे इंटेलेक्चुअलेस पोर ला सोबेरेनिया दे लोस् पुएब्लोस दे नुएस्ट्रा अमेरिका”—*अर्थात “अपने अमेरिका के लोगों की संप्रभुता के लिए लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन बुद्धिजीवियों का प्रथम सम्मेलन”—के लिए इकट्ठा हुए। कासा दे लास अमेरीकास द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में पूरे क्षेत्र से प्रतिभागी आए, जिनके अपने विविध वैचारिक और राजनीतिक नजरिये थे।
लेकिन, एक बात पर वे सभी एकमत थे : यह बात थी शांति, सुरक्षा तथा लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई देशों (अपना अमेरिका) की संप्रभुता के लिए रोनाल्ड रीगन और संयुक्त राज्य अमेरिका से पैदा खतरा। वास्तव में, सम्मेलन की कार्यवाहियों की प्रकाशित पुस्तक Nuestra América: En lucha por su verdadera independencia (नुएस्ट्रा अमेरिका: अपनी वास्तविक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष) की भूमिका में संपादकों ने इस बात को रेखांकित किया कि सम्मेलन का माहौल एक असाधारण राजनीतिक तीव्र इच्छा से भरा हुआ था। उन्होंने उरुग्वे के पत्रकार, उपन्यासकार और कवि मारियो बेनेडेट्टी द्वारा वर्णित उस स्थिति की ओर भी संकेत किया, जिसे उन्होंने रीगन के खतरे के खिलाफ सम्मेलन के प्रतिभागियों की “अभूतपूर्व एकता” कहा था। संपादक आगे लिखते हैं:
“...न्यूट्रॉन बम, हथियारों की दौड़ को उन्मादी ढंग से तेज करने, शीत युद्ध को भड़काए रखने का हठ, समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति के उद्देश्य के प्रति घृणा और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे देशों के विरुद्ध अपने बार-बार के हमलों के जरिये रोनाल्ड रीगन ने अनजाने में ही बैठक में हिस्सा ले रहे लोगों को यह समझने में मदद की कि भले ही अमेरिकी साम्राज्यवाद की आक्रामकता, ताकत की बजाय उसकी कमजोरी को दिखाती है, फिर भी वह एक शक्तिशाली दुश्मन है जो हमारे लोगों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है, और हमें उसे परास्त करने के लिए अपने पास उपलब्ध सभी संसाधनों का उपयोग करते हुए दृढ़ता से उसका मुकाबला करना होगा।”
संक्षेप में कहा जाए तो रोनाल्ड रीगन ने न केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद का असली चेहरा बेनकाब किया, बल्कि उसकी अंदरूनी कमजोरियों और रक्षा जोखिमों को भी सामने ला दिया।
सम्मेलन में प्रस्तुत सबसे उल्लेखनीय और प्रेरक योगदानों में से एक था प्यूर्टो रिको के राजनीतिक वैज्ञानिक मैनुएल माल्दोनादो-डेनिस (1933–1992) का व्याख्यान।
यह व्याख्यान पहले स्पेनिश भाषा में नुएस्ट्रा अमेरिका में निबंध के रूप में*—“La liberación nacional: imperativo categórico de Nuestra América”* शीर्षक से—प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1982 में, यह हवाना से प्रकाशित पत्रिका ट्राइकॉन्टिनेंटल में अंग्रेजी में*—“नेशनल लिबरेशन : कैटेगोरिकल इंपरेटिव फॉर द पीपुल्स ऑफ ऑवर अमेरिका (National Liberation: Categorical Imperative for the Peoples of Our America)”* शीर्षक से छपा।
डेनिस के इस निबंध में हवाना सम्मेलन की लड़ाकू और जुझारू भावना साफ दिखाई देती है। वह ‘अपने अमेरिका’ में आदिवासी और अफ्रीकी लोगों के लंबे प्रतिरोध के इतिहास तथा किसानों और मजदूरों के स्वतंत्रता संघर्षों को याद करते हैं। वे राष्ट्रीय मुक्ति के मुख्य कार्यों की भी याद दिलाते हैं: “ क) राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष; ख) उन सूक्ष्म और स्पष्ट औपनिवेशिक रूपों के खिलाफ संघर्ष जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता मिलने के बाद भी बने रहते हैं; ग) आर्थिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष—अर्थात पूरे राष्ट्र के हित में उपयोग के लिए उत्पादन के उन सभी साधनों को वापस हासिल करना जो अभी भी निजी हाथों में हैं; घ) उत्पादन के इन साधनों का सामाजिक स्वामित्व और समाजवाद के निर्माण की प्रक्रिया।”
सबसे महत्वपूर्ण बात, माल्दोनादो-डेनिस के अनुसार राष्ट्रीय मुक्ति तभी संभव है जब उसकी रक्षा के लिए क्षेत्रीय एकता कायम की जाए।
इसी कारण, यह हैरानी की बात नहीं है कि अपने पूर्ववर्ती रीगन की तरह ही डोनाल्ड ट्रंप भी क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवाद की उन्मादी हिंसा को भड़का रहे हैं और ‘अपने अमेरिका’ के देशों और लोगों के बीच फूट और अविश्वास फैलाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। यह बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था कि हमारी अमेरिकी जनता अपने साझा हितों को समझे, एकजुट हो और उस साम्राज्यवादी दानव के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष शुरू करे।
हम नीचे मैनुएल माल्दोनादो-डेनिस के निबंध “राष्ट्रीय मुक्ति : अपने अमेरिका के लोगों के लिए परम नैतिक कर्तव्य” को फिर से प्रकाशित कर रहे हैं।
आदर्शवादी दार्शनिक इमैनुएल कांट ने जब इस बात का सार समझाने का प्रयास किया कि प्रत्येक व्यक्ति का पूरी मानवता के प्रति नैतिक दायित्व क्या है तो उन्होंने इसे इस तरह परिभाषित किया: “हमेशा इस तरह आचरण करने का प्रयास करो कि तुम्हारे व्यवहार का सिद्धांत एक सामान्य नियम बन सके।” कोनिग्सबर्ग के इस ख्यातिलब्ध दार्शनिक के नैतिक दर्शन में इस सिद्धांत को “श्रेणीगत अनिवार्यता या परम नैतिक कर्तव्य” कहा गया। 19वीं सदी के विचारक जोस मार्ती की मशहूर सीख में भी यह सिद्धांत प्रतिध्वनित होता है : “हर असल मनुष्य को किसी भी दूसरे मनुष्य के गाल पर पड़े थप्पड़ को अपने ही गाल पर पड़ा हुआ महसूस करना चाहिए।” मानवता का यह दायित्व मानव एकजुटता की प्रक्रिया से ही जन्म लेता है : जहाँ भी अन्याय और उत्पीड़न हो, उसके खिलाफ संघर्ष करना।
यह बात केवल व्यक्तियों पर ही नहीं, बल्कि जनता पर भी लागू होती है। इसी कारण मार्ती हमें मोंटेक्रिस्टी घोषणापत्र में बताते हैं: “यह सोचकर भावुकता और गर्व होता है कि जब कोई स्वतंत्रता सेनानी क्यूबा की धरती पर शहीद होता है, शायद उन लापरवाह या उदासीन राष्ट्रों द्वारा त्यागा हुआ, जिनके लिए उसने अपनी आहुति दी, तो उसका यह बलिदान पूरी मानवता के कल्याण के लिए; अमेरिका में नैतिक गणराज्य की स्थापना के लिए और एक ऐसे मुक्त द्वीपसमूह के निर्माण के लिए होता है, जहां सम्मानित राष्ट्र अपनी संपदा ला सकें, जिसका प्रसार विश्व के चौराहों तक हो।” क्या इस अंतरराष्ट्रीयतावादी भावना की इससे बेहतर या अधिक पूर्ण अभिव्यक्ति की कल्पना की जा सकती है? यही वह भावना थी जिसने मार्ती का मार्गदर्शन किया और जो आज भी उन सभी लोगों की प्रेरणाश्रोत है, जो साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को केवल राष्ट्रीय सरहदों तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष का केंद्र समझते हैं—चाहे वह फिलिस्तीन हो या दक्षिण अफ्रीका, अल सल्वाडोर हो या प्यूर्टो रिको। श्रेणीगत अनिवार्यता या परम नैतिक कर्तव्य एक आदेश है—एक स्पष्ट आह्वान, जो सार्वभौमिक एकजुटता के कर्तव्य को पूरा करने की मांग करता है। आज के दौर में इस कर्तव्य का मतलब सामूहिक स्तर पर दुनिया के सभी लोगों की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्ष करना है।
विशेष रूप से “अपने अमेरिका” के संदर्भ में इसका आशय है साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के विरुद्ध सभी लोगों के संघर्षों का समर्थन करना। या फिर, बेमिसाल क्यूबाई मुक्तिदाता की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए कहें तो, इसका मतलब है—अपने पास उपलब्ध हर साधन से लगातार संघर्ष करना, ताकि हमारे सभी लोगों को उनकी पहली और दूसरी स्वतंत्रता मिल सके, जो लंबे समय से साम्राज्यवादी दबदबे और शोषण के स्थायी शिकार रहे हैं।
‘अपने अमेरिका’ का इतिहास मुक्ति संघर्षों के लिहाज से असाधारण रूप से समृद्ध रहा है। सौभाग्यवश, लैटिन अमेरिका के इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों की नई पीढ़ी ने इन सामाजिक संघर्षों को उस दबी हुई यादों से बाहर लाने का काम शुरू किया है, जहां उन्हें शासक वर्गों की सोच से गढ़ी गई आधिकारिक इतिहास-कथाओं ने रख दिया था। मूल आदिवासी जनसमुदायों के विद्रोह हों या अश्वेत दासों के संघर्ष, तुपाक अमारू हो या माकांदल, उत्पीड़न के खिलाफ ये सभी संघर्ष हमारे लोगों के इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय हैं। आम जन, श्रमिक वर्ग, ये “इतिहास-विहीन” लोग, अब मौजूदा ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की अगली पंक्ति में खड़े हैं। इसी सिलसिले में हम उन लोगों को देख सकते हैं जिन्होंने इनके पक्ष में आवाज उठाई और उत्पीड़न तथा लूट के विरुद्ध संघर्ष किया। इस दृष्टि से हम 19वीं सदी की हैती क्रांति, 20वीं सदी की क्यूबाई क्रांति, हाल की सांदिनिस्ता क्रांति और इस समय सल्वाडोर की जनता द्वारा शुरू किया गया गौरवपूर्ण संघर्ष—इन सबको उनके सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं।
हमारे युवा महान विभूतियों जैसे; तूसां लूवेरत्यूर, सिमोन बोलिवार, रामोन एमेटेरियो बेटांसेस, यूजेनियो मारिया दे होस्तोस, जोसे मार्ती, ऑगस्तो सेसर सान्दीनो, ऑगस्तो फराबुंदो मार्ती, जूलियो अंतोनियो बेला, पेद्रो अल्बिजू कैंपोस, एर्नेस्तो ग्वेरा, साल्वादोर आयेंदे, संक्षेप में उन सभी से खुद को जोड़ सकते हैं, जिन्होंने अपने वचन और कर्मों से ‘अपने अमेरिका’ के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। और निस्संदेह, इसमें उन अनाम नायकों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो हर दिन, हर जगह, संघर्ष के हर मोर्चे पर हमारे समाजों में आम जनता के सम्मानजनक जीवन के अटल अधिकार को नकारने की कोशिशों का विरोध करते हुए लड़ रहे हैं।
राष्ट्रीय मुक्ति की अवधारणा को समझने के लिए एक गहन और विशद अध्ययन की जरूरत है, जिसे इस छोटे से लेख में पूरी तरह पेश करना संभव नहीं है। फिर भी, यदि हमें इसका मुख्य खाका खींचना हो तो हम उसे इस प्रकार रख सकते हैं: क) राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष; ख) प्रभुत्व के उन सूक्ष्म और स्पष्ट रूपों के खिलाफ संघर्ष, जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता हासिल कर लेने के बाद भी बने रहते हैं; ग) आर्थिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष—यानी, उत्पादन के उन सभी साधनों को राष्ट्र के उपयोग और हित के लिए वापस हासिल करना, जो अब भी निजी हाथों में हैं; घ) उत्पादन के इन साधनों का सामाजिक स्वामित्व और समाजवाद के निर्माण की प्रक्रिया। राष्ट्रीय मुक्ति की प्रक्रिया के पूर्ण विकास के लिए ये सभी कदम उठाने आवश्यक हैं और जैसा कि जाहिर है, यह प्रक्रिया अंततः समाजवाद पर आकर पूरी होती है।
इन प्रक्रियाओं के उतार-चढ़ाव का व्यापक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि ये शायद ही कभी सीधी रेखा में आगे बढ़ीं हों। इसके बजाय, हर प्रक्रिया में आगे बढ़ने और पीछे हटने—दोनों ही दौर आए हैं। फिर भी एक बात तो बिल्कुल साफ है : लोगों का मुक्ति-संघर्ष कुछ समय के लिए रोका जा सकता है; यहां तक कि आम जनता के सुनियोजित दमन के जरिये उसे लंबे समय तक दबाया भी जा सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म कभी नहीं किया जा सकता। जैसा कि दक्षिणी कोन और मध्य अमेरिका के देशों में साफ देखा गया है कि जब साम्राज्यवादी दबदबे की व्यवस्था खतरे में पड़ती है तो वह फासीवादी तरीकों का सहारा लेने लगता है।
अब हम ऊपर गिनाए गए राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के प्रत्येक पहलू को और अधिक विस्तार से परखेंगे।
सबसे पहले, यह जाहिर है जनता अपनी संप्रभुता का प्रयोग कर सके, इसके लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता अनिवार्य है। 16वीं सदी में ज्यां बोदैं ने जब संप्रभुता की अवधारणा को परिभाषित किया तब इसका आशय था—किसी निश्चित भू-भाग के भीतर सर्वोच्च सत्ता का प्रयोग। लेकिन इस अवधारणा को केवल कानूनी नहीं, बल्कि वास्तविक बनाने के लिए जरूरी है कि संप्रभुता का मूल स्रोत खुद जनता हो। इसीलिए, सत्ता के स्रोत को किसी दूसरे देश के हाथों में सौंप देने वाले उपनिवेशवाद का अर्थ है—संप्रभुता के सिद्धांत को पूर्णतः अस्वीकार करना।
इसीलिए, राष्ट्रीय स्वतंत्रता लोगों की सबसे बुनियादी आजादी है, क्योंकि यही उन्हें किसी निश्चित भू-भाग पर अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करने की शक्ति देती है। यह बात जगजाहिर है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता हासिल होने के बाद भी संप्रभुता का उल्लंघन किया जा सकता है। इसी कारण लोगों का राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष साम्राज्यवाद पर सीधा और निर्णायक प्रहार होना चाहिए, जो दुनिया के लोगों की मुक्ति का घातक शत्रु है। जो लोग यह नहीं समझते कि साम्राज्यवाद वैश्विक प्रभुत्व की एक व्यवस्था है;जो यह नहीं पहचानते कि यह व्यवस्था—जैसा कि लेनिन ने बिल्कुल सही कहा था—पूँजीवाद की एकाधिकार अवस्था का सर्वोच्च चरण है; जो यह नहीं समझते कि समाजवादी देशों ने कभी भी उन लोगों के कुदरती और मानवीय संसाधनों की लूट में भाग नहीं लिया है जो उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के शिकार रहे हैं और आज भी हैं, बल्कि इसके उलट उन्होंने पिछड़ेपन के खिलाफ उनके संघर्ष में मदद की है—वे अपने ऐतिहासिक नजरिये में गंभीर रूप से गलत हैं, जैसा कि फिदेल कास्त्रो ने अनेक मौकों पर कहा है। तुपाक अमारू से लेकर आज तक ‘अपने अमेरिका’ के लोगों के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष एक साथ ही साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष रहे हैं।
लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति की प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्वतंत्रता केवल एक पड़ाव भर है—बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव। स्वतंत्रता हासिल होने के बाद एक नई समस्या सामने आती है—वे निर्भर संबंध, जो समाप्त होने का नाम नहीं लेते हैं और नई संप्रभु स्थिति के भीतर भी दोबारा पैदा होते रहते हैं। इन निर्भर संबंधों की जड़ें गहरी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचनाओं में होती हैं।
जब कोई देश निर्भर पूँजीवाद की व्यवस्था के भीतर आजादी हासिल करता है—जैसा कि अक्सर हुआ है—तो असमान विकास और आर्थिक पिछड़ेपन को बनाए रखने वाले जिद्दी कारकों के चलते कठिनाई से हासिल की गई उसकी आजादी लगभग निष्प्रभावी हो जाती है। जैसा कि एक नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को बनाने के असफल प्रयासों और अति प्रचारित उत्तर–दक्षिण संवाद की विफलता से साफ है कि पूँजीवादी देश कच्चे माल और तैयार माल के बीच असमान विनिमय से मिलने वाले अपने विशेषाधिकार और हक छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। कच्चा माल निर्यात करने वाले देशों द्वारा अपने संसाधनों पर संप्रभुता का प्रयोग करने के प्रयासों को आयातक देशों की खुली दुश्मनी मोल लेनी पड़ी है। इसके बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों पर जनता की पूर्ण संप्रभुता की मांग मेक्सिको में जनरल लाजारो कार्देनास ने उठाई थी और उनके इस कदम से एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो गई, जिसे अब पलटा नहीं जा सकता। इस कदम से पहले से बदनाम यह धारणा पूरी तरह खारिज हो गई कि हमारे लोग अपने हक के संसाधनों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हैं।
इसलिए, अगर आर्थिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं होता तो राष्ट्रीय स्वतंत्रता के केवल नाम मात्र की संप्रभुता बनकर रह जाने का खतरा पैदा हो जाता है। 19वीं सदी में मार्ती ने हमें चेतावनी दी थी कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता हासिल होने के बाद भी एक बाघ हमारे लोगों का पीछा करता रहता है। इस बाघ से सतर्क रहना जरूरी है, क्योंकि वह रात के अंधेरे में बार-बार लौटता है और जनता द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों को खतरे में डाल देता है। कहने की जरूरत नहीं कि यह बाघ उसी साम्राज्यवाद का प्रतीक था, जिसे मार्ती बखूबी जानते थे, क्योंकि वे उसके भीतर रह चुके थे। इसी कारण उन्होंने ‘अपने अमेरिका’ के लोगों को चेताया कि वे उस दूसरी स्वतंत्रता के लिए दृढ़ता से संघर्ष करें, जिसे केवल उस “हिंसक और क्रूर उत्तर” पर सीधा प्रहार करके ही पाया जा सकता है, “जो हमें तुच्छ समझता है।” आर्थिक स्वतंत्रता, संप्रभुता के वास्तविक प्रयोग के लिए अनिवार्य शर्त है। यह जनता की मांग है कि वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से थोपी गई शर्तों के अधीन न हों; उनके प्राकृतिक और मानवीय संसाधन अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक और वित्तीय पूँजी के अधीन न किए जाएँ; और उनकी जमीन पर सेना और नौसेना के अड्डे न बनाए जाएँ, जो जनता की संप्रभुता को समाप्त कर देते हैं। इस अंतिम बिंदु के संदर्भ में एक ऐसा उदाहरण क्यूबा में ग्वांतानामो का सैन्य अड्डा है जो आज भी हमारे लोगों के लिए घोर अपमान का सबब बना हुआ है।
अब तक कही गई बातों से यह साफ हो जाता है कि जनता द्वारा अपनी संप्रभुता का पूर्ण प्रयोग करने के लिए किए जाने वाले संघर्ष की परिणति अंततः उत्पादन के मुख्य साधनों के सामाजिक स्वामित्व और समाजवाद की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में होनी चाहिए। बेशक, यह कोई आसान काम नहीं है। लेकिन क्यूबा, वियतनाम और अंगोला की जनता की निर्णायक जीतों ने—सिर्फ तीन उदाहरणों का उल्लेख करें तो—पश्चिमी शासक वर्गों में प्रतिशोध की भावना पैदा की है। आज इसी भावना की राजनीतिक अभिव्यक्ति रीगन प्रशासन का सत्ता में आना है।
मौजूदा राजनीतिक हालात में, दुनिया के सभी लोगों की राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संप्रभुता अमेरिका के शासक वर्ग के सबसे हठधर्मी और सैन्यवादी गुट के सत्ता में आने से खतरे में पड़ गई है। कैरिबियाई क्षेत्र में निकारागुआ और ग्रेनेडा को आए दिन दखल की धमकियों मिल रही हैं, जो अमेरिकी प्रभुत्व के तहत हमारे लोगों के इतिहास का हिस्सा रही हैं। क्रांतिकारी क्यूबा भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के नए हमलों से रू-ब-रू हो रहा है। इस शक्ति को रोक पाने, विश्व पर दबदबा कायम करने की इसकी विक्षिप्त लालसा का मुकाबला कर पाने की ताकत एकमात्र समाजवादी विश्व के वजूद में है, जिसने उस अहंकार का सामना किया है जो अमेरिकी साम्राज्यवादी गणराज्य की स्थापना से ही उसकी विशेषता रही है।
एक वैश्विक दबदबे की व्यवस्था के रूप में साम्राज्यवाद राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ तभी रह सकता है जब वह पूँजीवादी उत्पादन संबंधों को चुनौती न दे। आजाद मुल्कों का आर्थिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ना ही साम्राज्यवाद को चुभने लगता है, हालाँकि नए व्यापारिक और औद्योगिक संबंध बनाने की संभावना हमेशा रहती है, जो सामाजिक संपत्ति के सामाजीकरण की प्रक्रिया को खोखला या निष्क्रिय बना देते हैं। लेकिन पूँजीवाद, समाजवाद की ओर बढ़ते उस संक्रमण को सहन नहीं कर सकता, जो “तीसरी दुनिया” के समाजों के जीवन और संपत्ति पर उसके प्रभुत्व को खतरे में डालता है। यहां तक कि जनता की सत्ता (पीपुल्स पावर) जैसी संरचनाएँ भी शासक वर्गों को स्वीकार्य नहीं हैं। साम्राज्य अवज्ञाकारी बच्चों को बर्दाश्त नहीं करता—वह पूर्ण समर्पण चाहता है। यदि ऐसा न हो तो इसका अर्थ युद्ध होता है। यह आक्रमण पहले आर्थिक हमले के रूप में शुरू होता है, लेकिन अपने व्यापक संसाधनों के बल पर यह रासायनिक और जैविक युद्ध तक भी जा सकता है।
इसी संदर्भ में लोग अपनी संप्रभुता के लिए संघर्ष कर रहे हैं—यानी, अपने राष्ट्रीय क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण के लिए, जिसमें भूगर्भ के संसाधन, आसपास के समुद्री क्षेत्र, जीव-जंतु, वनस्पति, जल संसाधन आदि शामिल हैं। यह संप्रभुता तब तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकती, जब तक कि वास्तविक सत्ता उस सामाजिक वर्ग के हाथ में न हो जो सामाजिक संपदा का उत्पादन करता है—वह वर्ग जो मानवता की विरासत माने जाने वाले प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ भौतिक उत्पादन शक्तियों का सबसे अहम घटक है—यानी श्रमिक वर्ग।
श्रमिक वर्ग ही वह शक्ति है जिसे किसानों और अन्य जनप्रिय वर्गों के साथ मिलकर राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवाद के संघर्ष में ऐतिहासिक नेतृत्व की भूमिका निभाने का आह्वान किया गया है। यही हमारे लोगों की संप्रभुता हासिल करने का अकेला रास्ता है।
जब हमारे पहले मुक्तिदाताओं ने विखंडित होते स्पेनिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष किया तो उनका मुख्य उद्देश्य उस भयावह दमनकारी व्यवस्था का अंत करना था, जो हमारे लोगों के पूर्ण नैतिक और भौतिक विकास में बाधा बन रही थी। उदाहरण के लिए, एंटिलीज में यह महान संघर्ष केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि अश्वेत लोगों की दासता को समाप्त करने के लिए भी किया गया था। इसी अर्थ में 19वीं सदी की एंटिलीज की तीन महान हस्तियाँ—होस्तोस, बेटांसेस और मार्ती—सिर्फ ऐसे क्रांतिकारी नहीं थे जिन्होंने स्पेन से औपनिवेशिक संबंध तोड़ने के लिए संघर्ष किया, बल्कि वे यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि नए गणराज्यों में अश्वेत दासता को किसी भी रूप में सहन किया जाएगा। उन्होंने राजनीतिक क्रांति के साथ ही सामाजिक क्रांति के लिए भी संघर्ष किया। उस समय तक कार्ल मार्क्स “कैपिटल” का पहला खंड लिख चुके थे और इंटरनेशनल वर्किंगमेंस एसोसिएशन की स्थापना कर चुके थे। लेकिन समाजवाद, एक ऐतिहासिक दृष्टि के रूप में—जो उस समय के यूरोप के लिए उपयुक्त था—इन महान एंटिलीज क्रांतिकारियों की राजनीतिक सोच में न तो दिखाई दिया और न ही दिखाई दे सकता था।
एंटिलीज की मुक्ति का संघर्ष उसी समय शुरू हुआ जब साम्राज्यवाद उपनिवेशों के लिए पागलपन की हद तक होड़ कर रहा था। इसके चलते दुनिया की दो-तिहाई से अधिक आबादी पूँजीवादी विस्तार का शिकार बनी। साल 1883 में निधन से पहले मार्क्स इस प्रक्रिया का विश्लेषण शुरू कर चुके थे, लेकिन इसका अधिक विशद और व्यवस्थित वर्णन वी. आई. लेनिन की कृति “साम्राज्यवाद: पूँजीवाद की सर्वोच्च अवस्था” में सामने आया। हालाँकि लेनिन से पहले ही मार्ती ने साम्राज्यवादी परिघटना का शानदार वर्णन किया और उसे साफ तौर पर साम्राज्यवाद कहने में नहीं हिचके, फिर भी बेशक वह लेनिन ही थे जिन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर इसका विश्लेषण किया और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की ऐतिहासिक भूमिका को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। इस प्रकार उपनिवेश-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों को राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवाद के संघर्ष से जोड़ने की वैचारिक नींव पड़ी। इसका इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है, जितना कि महान क्रांतिकारी और जननेता हो ची मिन्ह का जीवन और कार्य है।
इसलिए, लैटिन अमेरिकी क्रांतिकारी परंपरा—जिस हद तक वह लगातार साम्राज्यवाद-विरोधी रही है—आज के दौर में जनता द्वारा अपनी संप्रभुता के प्रयोग और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए किए जा रहे संघर्ष के साथ पूरी तरह मेल खाती है। *‘ग्रितो दे यारा’*की शताब्दी पर फिदेल कास्त्रो ने 19वीं सदी के क्रांतिकारियों का उल्लेख करते हुए कहा था कि अगर वे आज जीवित होते तो वे हमारे जैसे होते और अगर हम उस समय होते तो हम उनके जैसे होते। अगर हम मानव इतिहास के सबसे ताकतवर दुश्मन का सामना करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं तो हमें इस चुनौती का सामना करना ही होगा।
अंत में एक बात और। जिन देशों को मार्ती ने “अपना अमेरिका” कहा था, वहां के लोगों की राष्ट्रीय मुक्ति तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक कि उन सभी देशों को आजादी न मिल जाए, जिनके मुक्त होने का सपना बोलिवार ने देखा था। मैं खुद एक अमेरिकी उपनिवेश से आता हूँ, जो कैरिबियन में अमेरिका के दबदबे की श्रृंखला की सबसे मजबूत कड़ियों में से एक है। महान एर्नेस्टो ‘चे’ ग्वेरा ने साफ तौर पर कहा था कि किसी के साम्राज्यवाद-विरोध को प्यूर्टो रिको के साथ उसकी एकजुटता की हद से मापा जा सकता है। एक सदी से भी अधिक समय से हमारे लोग स्वतंत्रता और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से अब तक बोलिवार की कविता की यह अंतिम पंक्ति लिखी नहीं जा सकी है। लेकिन जब तक प्यूर्टो रिको को पूर्ण संप्रभुता और स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती तब तक “अपने अमेरिका” के सभी लोगों की संप्रभुता संकट में बनी रहेगी। इसलिए, निष्कर्ष रूप में हम यह दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि प्यूर्टो रिको की राष्ट्रीय मुक्ति एक अनिवार्य ऐतिहासिक आवश्यकता है, जिसके लिए दुनिया के सभी लोगों की सक्रिय और संघर्षशील एकजुटता की जरूरत है।
— मैनुअल माल्दोनादो-देनिस “राष्ट्रीय मुक्ति: अपने अमेरिका के लोगों के लिए परम नैतिक कर्तव्य” ट्राइकॉन्टिनेंटल 82 (1982), पृष्ठ 8-15 .
